After 64 years - Only Name..of Gandhiji’s !!
बापुभी नही आसुभी नही - राजेन्द्र त्रिवेदी
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बापु भी नही आसु भी नही,
चौसठ साल.. गुजरते भि,
सो्चते चौसठ साल गुजरे,
बापु भी नही आसु भी नही,
बेटा या बागवान भी नही.
बापु बन गये राष्ट्रपिता.
राष्ट्रपिता. बागवान नही.
क्या नाम पे ही पेट भरना ?
क्या राम का ही नाम रटना ?
बापुके जिवन को पढ कर,
जिवन सारा व्यर्थ करते.
सारा भारत नाम रटते,
बापुको ना सोचते पल,
राम को ही खोजने को,
जानको भी छोड मरते.
साल पर सब साल गुजरते.
पार्लामेन्ट मे सिट भरके ,
पेट भरके सब जिवनको,
नवजीवन से दुर रखते.
कब वो बापु बोल पागे?
कब ये भारत फिरसे जागे?
बापुका ”हे राम” चिख के,
जुम्मा का दिन फिर जगाये.
रामराज्य तो तब बने गा,
सब जनो मै राम होगा.
रामका ही गान होगा,
राज फिरसे साथ होगा.
सोमके दिन शिव जगाके,
बापुको हम फिर बुलाए,
रामका ही गान करके,
तिस जनवरी फिर बुलाए.
राजेन्द्र त्रिवेदी