गगन चढइ रज पवन प्रसन्गा – Rajendra Trivedi

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પીળા પાન…

પથરાયા પાનખરે,

પીળા પિતામ્બર ધારી બનીને ,

નભથી ઉતરી આવી ધરા પર,

બેઠા નજરે દિઠા તુજ ને.

જીવતા જીવન જીવને જોતા,

વર્ષો વિતતા વારે ધાતા,

મનમા મલકી મુજને પુછે,

કયા મલકમા જાવુ તુજને?

આ જે ઉડી અવની જાતા,

વાયુ વેગે ઉડૅ ધરા પર,

લાગ્યુ મુજને તવ આધારે,

રામાયણ ના ગીત મધુરે.

गगन चढइ रज पवन प्रसन्गा.

Rajendra Trivedi

About dhavalrajgeera

Physician who is providing free service to the needy since 1971. Rajendra M. Trivedi, M.D. who is Yoga East Medical Advisor www.yogaeast.net/index.htm http://www.yogaeast.net/index.htm Graduated in 1968 from B. J. Medical College, Amadavad, India. Post Graduate training in Neurological Surgery from Charles University in Czechoslovakia. 1969 - 71. and received Czechoslovakian Government Scholarship. Completed training at the Cambridge Hospital and Harvard University in Psychiatry. Rajendra M. trivedi is an Attending Psychiatrist at Baldpate Hospital. He is the Medical Director of CCA and Pain Center in Stoneham, MA where he has been serving the community since 1971 as a Physician. OTHER AFFILIATIONS: Lifer of APA - American Psychiatrist Association Senior Physician and Volunteer with Massachusetts Medical Society and a Deligate of the Middlesex District. www.massmed.org Patron member of AAPI - American Association of PHYSICIANS OF INDIA. LIFE MEMBER OF IMANE - Indian Medical Association of New England. Member of the Board of Advisors "SAHELI, Boston,MA. www.saheliboston.org/About1/A_Board Dr. Trivedi is working closely with the Perkin's School for the Blind. www.perkins.org. Dr. Trivedi is a Life member and Honorary Volunteer for the Fund Raising Contact for North America of BPA - Blind People Association of Amadavad, India. www.bpaindia.org Dr.Trivedi is the Medical Advisor for Yoga East since 1993. He is a Physician who started Health Screening and Consultation At Shri Dwarkami Clinic in Billerica, MA. https://www.dwarkamai.com/health-and-wellness

3 responses »

  1. गगन चढइ रज पवन प्रसंगा , कीचहि मिले नीच जल संगा ..
    आसमान की और उठने वाली वायु के सम्पर्क में आकर धूल आसमान
    में पहुँच जाती है और वही धूल जब नीच जल (जल में नीचे की और
    बहने की प्रव्रति होति है ,इसलिये यह उपमा दी गयी है ) के सम्पर्क में
    आती है तो कीच का रूप ले लेती है इसलिये अच्छी संगति पर विशेष
    जोर दिया गया है
    मनुष्य का मन परिवर्तनशील है। उस पर संग का प्रभाव निरन्तर देखने में आता है। अल्प सत्संग के कारण रत्नाकर डाकू से महामुनि वाल्मीकि बन गया और अल्प कुसंग से कैकेयी का जीवन सदा-सदा के लिए निन्दनीय हो गया। संग के असर के बारे में प्रस्तुत उदाहरण बड़ा उपयोगी सिद्ध होगा।
    एक बार खयास अपने शिष्य के साथ यात्रा कर रहे थे। चलते-चलते नमाज का वक्त हो गया। सन्त तथा शिष्य दोनों ने झरने के पानी से “वजू” किया और चद्दर बिछाकर नमाज पढ़ने लगे। उसी समय वन में से सिंह की गर्जना सुनाई पड़ी। सुनते ही शिष्य के प्राण सूख गए। वह भागकर एक पेड़ पर चढ़ गया। खयास नमाज पढ़ते रहे। शेर उनके पास से दूसरी ओर चला गया। शिष्य नीचे आया। दोनों ने फिर यात्रा शुरू कर दी। अभी थोड़ी दूर ही गए होंगे कि खयास की नाक पर मच्छर ने काटा। चीख पड़े। आश्चर्य से शिष्य ने कहा- शेर की दहाड़ से तो जरा भी नहीं डरे। मच्छर के काटने पर इस तरह की चीख?
    सन्त हंसने लगे। बोले- उस समय मैं खुदा के साथ था, इस समय तुम्हारे साथ!
    कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य दिनभर में जहां-जहां जाता है, उसके विचारों पर उन सब स्थानों का अवश्य ही असर होता है। यही कारण है कि उसके जीवन में अनेक विरोधाभास देखने में आते हैं। अगर इन विरोधाभासों से बचना है तो हर समय श्रेष्ठ लोगों के संग में ही रहना होगा। उनके विचारों का ही अनुसरण करना होगा। यही एक रास्ता है जो जीवन को श्रेष्ठ बनाने में सक्षम है।

  2. जीव तो नित्य है .फ़िर कैसा रोना..
    जीव तो नित्य है .फ़िर कैसा रोना..

    क्षिति जल पावक गगन समीरा .पँच रचित अति अधम शरीरा ..
    प्रगट सो तनु तब आगे सोवा , जीव नित्य तब केहि लग रोवा ..

    बाली के मरने पर श्रीराम ने समझाया कि हे तारा प्रथ्वी , जल .
    अग्नि , आकाश , और वायु इन पाँच तत्वों से इस अधम शरीर
    की रचना हुयी है लेकिन इसमें रहने वाला जीव अविनाशी और
    नित्य है इसलिये इसके (शरीर के ) मर जाने पर रोना व्यर्थ है .

    उमा कहँउ मैं अनुभव अपना , सत हरिनाम जगत सब सपना .

    शंकर जी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती मैं अपने अनुभव से
    कहता हूँ कि ये द्रश्यमान जगत एक सपना मात्र है .अर्थात वास्तव
    में नजर आने पर भी यह एक भ्रम मात्र ही है और इस माया प्रपँच
    मय जगत में हरि नाम (ढाई अक्षर का महामन्त्र ) ही सत्य का बोध
    कराने वाला है .

    गगन चढइ रज पवन प्रसंगा , कीचहि मिले नीच जल संगा ..

    आसमान की और उठने वाली वायु के सम्पर्क में आकर धूल आसमान
    में पहुँच जाती है और वही धूल जब नीच जल (जल में नीचे की और
    बहने की प्रव्रति होति है ,इसलिये यह उपमा दी गयी है ) के सम्पर्क में
    आती है तो कीच का रूप ले लेती है इसलिये अच्छी संगति पर विशेष
    जोर दिया गया है .

    अब प्रभु क्रपा करहु येहि भांती , सब तजि भजन करहुँ दिन राती ..

    हे प्रभु मैं माया में आकर आपको भूल गया था .अब इस प्रकार किरपा
    करें कि सब कुछ भुलाकर नाम (ढाई अक्षर का महामन्त्र में ) का सुमरण
    करूँ .

    यह फ़ल साधन से नहिं होई , तुम्हरी किरपा पाय कोई कोई

    हे प्रभु आपकी प्राप्ति किसी भक्ति ,या योग साधन या अन्य किसी साधन
    से नहीं होति बल्कि उल्टे ये तो अहम को और बङाने वाले हैं आपकी
    किरपा प्राप्त करने के लिये समर्पण ही सबसे उत्तम उपाय है..अर्थात
    समर्पण कर देने से आपकी क्रपा सहज ही होती है ..

    from –
    http://merasatguru.blogspot.com/2010/03/blog-post_31.html

    Thanks….
    Editor Tulsidal.

  3. यह रामचरित मानसका सार है

    राम का दंडकवन प्रवेश, जटायु मिलन, पंचवटी निवास और श्री राम-लक्ष्मण संवाद
    * है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ॥
    दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू॥8॥
    भावार्थ:-हे प्रभो! एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है, उसका नाम पंचवटी है। हे प्रभो! आप दण्डक वन को (जहाँ पंचवटी है) पवित्र कीजिए और श्रेष्ठ मुनि गौतमजी के कठोर शाप को हर लीजिए॥8॥
    * बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया॥
    चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई॥9॥
    भावार्थ:-हे रघुकुल के स्वामी! आप सब मुनियों पर दया करके वहीं निवास कीजिए। मुनि की आज्ञा पाकर श्री रामचंद्रजी वहाँ से चल दिए और शीघ्र ही पंचवटी के निकट पहुँच गए॥9॥
    दोहा :
    * गीधराज सै भेंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।
    गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ॥13॥
    भावार्थ:-वहाँ गृध्रराज जटायु से भेंट हुई। उसके साथ बहुत प्रकार से प्रेम बढ़ाकर प्रभु श्री रामचंद्रजी गोदावरीजी के समीप पर्णकुटी छाकर रहने लगे॥13॥
    चौपाई :
    * जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥
    गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥1॥
    भावार्थ:-जब से श्री रामजी ने वहाँ निवास किया, तब से मुनि सुखी हो गए, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गए। वे दिनोंदिन अधिक सुहावने (मालूम) होने लगे॥1॥
    * खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥
    सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥2॥
    भावार्थ:-पक्षी और पशुओं के समूह आनंदित रहते हैं और भौंरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहाँ प्रत्यक्ष श्री रामजी विराजमान हैं, उस वन का वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते॥2॥
    * एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥
    सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥3॥
    भावार्थ:-एक बार प्रभु श्री रामजी सुख से बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजी ने उनसे छलरहित (सरल) वचन कहे- हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी! मैं अपने प्रभु की तरह (अपना स्वामी समझकर) आपसे पूछता हूँ॥3॥
    * मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥
    कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥4॥
    भावार्थ:-हे देव! मुझे समझाकर वही कहिए, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिए और उस भक्ति को कहिए, जिसके कारण आप दया करते हैं॥4॥
    दोहा :
    * ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
    जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥14॥
    भावार्थ:-हे प्रभो! ईश्वर और जीव का भेद भी सब समझाकर कहिए, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जाएँ॥14॥
    चौपाई :
    * थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई॥
    मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥1॥
    भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है॥1॥
    * गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
    तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥2॥
    भावार्थ:-इंद्रियों के विषयों को और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई! उन सबको माया जानना। उसके भी एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो-॥2॥
    * एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा॥
    एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥3॥
    भावार्थ:-एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यंत दुःखरूप है, जिसके वश होकर जीव संसार रूपी कुएँ में पड़ा हुआ है और एक (विद्या) जिसके वश में गुण है और जो जगत्‌ की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नही है॥3॥
    * ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥
    कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥4॥
    भावार्थ:-ज्ञान वह है, जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी (दोष) नहीं है और जो सबसे समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात! उसी को परम वैराग्यवान्‌ कहना चाहिए, जो सारी सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो॥4॥

    (जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्य सेवा का अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इंद्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्‌ में सुख-बुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष-शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में प्रेम- ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्व ज्ञान के अर्थ (तत्त्वज्ञान के द्वारा जानने योग्य) परमात्मा का नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिए गीता अध्याय 13/ 7 से 11)
    दोहा :
    * माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
    बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥15॥
    भावार्थ:-जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिए। जो (कर्मानुसार) बंधन और मोक्ष देने वाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है, वह ईश्वर है॥15॥
    चौपाई
    * धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
    जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥1॥
    भावार्थ:-धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है- ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है॥1॥
    * सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
    भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥2॥
    भावार्थ:-वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधन का सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है और वह तभी मिलती है, जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं॥2॥
    * भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
    प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥3॥
    भावार्थ:-अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूँ- यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यंत प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने-अपने (वर्णाश्रम के) कर्मों में लगा रहे॥3॥
    * एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
    श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥4॥
    भावार्थ:-इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होने पर) मेरे धर्म (भागवत धर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यंत प्रेम होगा॥4॥
    * संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
    गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥5॥
    भावार्थ:-जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यंत प्रेम हो, मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो,॥5॥
    * मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
    काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥6॥
    भावार्थ:-मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से (प्रेमाश्रुओं का) जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वश में रहता हूँ॥6॥
    दोहा :
    * बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।
    तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥16॥
    भावार्थ:-जिनको कर्म, वचन और मन से मेरी ही गति है और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय कमल में मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥16॥
    चौपाई :
    * भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा॥
    एहि बिधि कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती॥1॥
    भावार्थ:-इस भक्ति योग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यंत सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्री रामचंद्रजी के चरणों में सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गए॥1॥

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